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TMC के 20 सांसदों का विलय दावा, लेकिन जिस पार्टी में जाना चाहते हैं उसे ही नहीं थी खबर

Satyakhabarindia

पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय बड़ा मोड़ आ गया जब टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने एक छोटी राजनीतिक पार्टी में विलय का दावा कर दिया। हैरानी की बात यह रही कि जिस पार्टी में शामिल होने की बात कही गई, उसके नेताओं को इसकी जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स से मिली।

अचानक हुए दावे ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल

बंगाल की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से लगातार नए समीकरण बनते और बिगड़ते रहे हैं। इसी बीच टीएमसी के 20 सांसदों द्वारा नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI में विलय का दावा सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई। सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मिलकर अलग पहचान की मांग भी रखी।

पार्टी नेतृत्व भी रह गया हैरान

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि NCPI के संस्थापक और राष्ट्रीय संगठन सचिव शांतनु दे को इस कथित विलय की जानकारी पहले से नहीं थी। उन्होंने कहा कि उन्हें यह खबर सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों के माध्यम से मिली। उनके अनुसार अभी तक इन सांसदों के साथ कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई है।

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स्वागत भी और संवैधानिक प्रक्रिया की बात भी

हालांकि शांतनु दे ने इस संभावना का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यदि पार्टी का विस्तार होता है तो यह खुशी की बात होगी। लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी राजनीतिक विलय के लिए संविधान और कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। बिना औपचारिक चर्चा और प्रक्रिया के कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सकता।

मोदी सरकार के समर्थन ने बढ़ाई चर्चा

NCPI का राजनीतिक रुख भी इस मामले को खास बनाता है। शांतनु दे ने खुलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार की नीतियों का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि मोदी के नेतृत्व में देश की कार्यशैली और विकास की दिशा में बड़े बदलाव आए हैं और उनकी पार्टी इन नीतियों का समर्थन करती है।

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छोटी पार्टी पर अचानक राष्ट्रीय फोकस

2023 में पंजीकृत NCPI अब तक राष्ट्रीय राजनीति में अपेक्षाकृत कम चर्चित रही है। सीमित संसाधनों और संगठनात्मक चुनौतियों के बावजूद पार्टी ने कुछ क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। अब अचानक 20 सांसदों के विलय के दावे ने इस पार्टी को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है।

आगे क्या होगा?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह दावा कानूनी और संवैधानिक रूप से वैध साबित होगा या फिर यह केवल राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है। आने वाले दिनों में पार्टी की प्रस्तावित प्रेस कॉन्फ्रेंस और संसदीय प्रक्रियाएं इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगी। फिलहाल बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक नजरें इसी घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।

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